
इसाई और मुस्लमान मत अन्यों को समाप्त करने हेतु कटिबद्ध है, उनका उद्देश्य केवल अपने मत पर चलना ही नहीं अपितु मानव धरम को नष्ट करना है, वे अपनी रास्त्र भक्ती ग़ैर मुस्लिम देश के प्रति नहीं रख सकते, वे संसार के किसी भी मुस्लिम और मुस्लिम देश के प्रति वफादार हो सकते हैं परंतु किसी अन्य हिंदु या हिंदु देश के प्रति नहीं.संभवतः मुस्लमान और हिंदु एक दुसरे के प्रति बनावटी मित्रता तो स्थापित कर सकते हैं परंतु स्थायी नहीं,
लिया गया है :- रविन्द्र नाथ बाद्मय २४ वां खंड पृष्ठ २७५ टाइम्स ऑफ़ इंडिया १७/०४/१९२७ कालांतर
1 टिप्पणी:
प्रेमचंद जी ‘‘इस्लामी सभ्यता’’ पुस्तिका जो मधुर संदेश संगम, दिल्ली से भी छपी है, में लिखते हैं:
‘‘जहां तक हम जानते हैं कि किसी धर्म ने न्याय को इतनी महानता नहीं दी जितनी इस्लाम ने।’’ पृष्ठ 5
‘संसार की किसी सभ्य से सभ्य जाति की न्याय-नीति की इस्लामी न्याय-नीति से तुलना कीजिए, आप इस्लाम का पल्ला झुकता हुआ पाएँगे।’’ पृष्ठ 7
‘‘हिन्दू-समाज ने भी शूद्रों की रचना करके अपने सिर कलंक का टीका लगा लिया। पर इस्लाम पर इसका धब्बा तक नहीं। गुलामी की प्रथा तो उस समस्त संसार में भी, लेकिन इस्लाम ने गुलामों के साथ जितना अच्छा सलूक किया उस पर उसे गर्व हो सकता है।’’ पृष्ठ 10
‘‘हमारे विचार में वही सभ्यता श्रेष्ठ होने का दावा कर सकती है जो व्यक्ति को अधिक से अधिक उठने का अवसर दे। इस लिहाज से भी इस्लामी सभ्यता को कोई दूषित नहीं ठहरा सकता।’’ पृष्ठ 11
‘‘हम तो याहं तक कहने को तैयार हैं कि इस्लाम में जनता को आकर्षित करने की जितनी बडी शक्ति है उतनी और किसी सस्था में नही है। जब नमाज़ पढते समय एक मेहतर अपने को शहर के बडे से बडे रईस के साथ एक ही कतार में खडा पाता है तो क्या उसके हृदय में गर्व की तरंगे न उठने लगती होंगी। उसके विरूद्ध हिन्दू समाज न जिन लोगों को नीच बना दिया है उनको कुएं की जगत पर भी नहीं चढने देता, उन्हें मंदिरों में घुसने नहीं देता।’’ पृष्ठ 14
antimawtar.blogspot.com
islaminhindi.blogspot.com
एक टिप्पणी भेजें